महाविद्यालय में आपका हार्दिक स्वागत है।

प्रतापगढ़जनपद के मुख्य स्तंभ घंटाघर से रायबरेली-जौनपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर रानीगंज तहसील लगभग 17 किलोमीटर पर स्थित है रानीगंज थाना से जामताली जनपद मार्ग पर 3 किलोमीटर पर लच्छीपुर नामक बाजार है जहां से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर पूरे गोसाई नामक ग्राम अंचल में स्वामी करपात्री जी महाराज राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय की स्थापना की गई है
इसलिए इस महाविद्यालय का निर्माण और भी आवश्यक था ताकि रानीगंज क्षेत्र में आने वाले ग्रामीण छात्र अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के लिए किसी सरकारी डिग्री कॉलेज में प्रवेश लेकर अपने भविष्य को और बेहतर बना सकें।

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008

उपलब्ध विषयों की संख्या

013

शिक्षण कक्षों की संख्या

009

प्राध्यापकों की संख्या

200

वर्तमान विद्यार्थियों की संख्या

आधारभूत संसाधन

महाविद्यालय में विद्यार्थियों की सुगमता के लिए प्रायः सभी आधारभूत संसाधनों की व्यवस्था है। समय-समय पर उत्तर प्रदेश सरकार और यूजीसी से प्राप्त अनुदानों का औचित्यपूर्ण उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया जाता है कि इस ग्रामीण अंचल में भी महाविद्यालय में विद्यार्थियों को आधारभूत सुविधाओं से वंचित न होना पड़े। लगभग 06 एकड़ के विस्तृत परिसर में स्थित इस महाविद्यालय भवन में विविध सुविधाओं की उपलब्धता है। जैसे- पुस्तकालय, वाचनालय, वाहन-स्टैण्ड,विद्युत व्यवस्था, सामान्य कक्ष, क्रीड़ा क्षेत्र,कम्प्यूटर कक्ष, पेयजल एवं प्रसाधन, छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति प्रकोष्ठ एवं अनुशास्ता मण्डल एवं महिला प्रकोष्ठ।

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सम्पूर्ण विवरणमहाविद्यालय परिचय

हमें क्यों चुनें?

ग्रामीण परिवेश में स्थित होने के कारण यह महाविद्यालय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए एक संजीवनी की तरह है जो सीमित संसाधन होने के कारण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं राजकीय विद्यालय होने से कम शुल्क एवं विशेष परिस्थितियों में निशुल्क शिक्षा का पूर्ण दायित्व कालेज स्वयं वहन करता है। गरीब एवं ग्रामीण छात्र निसंकोच होकर अपना मनपसंद विषय चुनकर उसका गहराई से अध्ययन कर के अच्छे अंकों के साथ परीक्षा में बेहतर परिणाम लाकर अपने परिवार के लोगों को गर्व का अनुभव कराने के साथ ही समाज एवं देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दे सकने में सक्षम हो सकते हैं।

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बौद्धिक विकास

किसी विषय को समझने के लिए उस विषय को सरलता से छात्र-छात्राओं को समझाना ताकि वह गहराई से उस विषय …

विचारों का निर्माण

किसी विषय में मात्र पुस्तकीय ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि समय-समय पर शैक्षणिक भ्रमण एवं प्रयोगिक विज्ञान के द्वारा …

वैश्विक शिक्षण

भारत अपने आप में एक विशाल राष्ट्रीय हैं यहां का इतिहास यहां की संस्कृत भाषा रहन-सहन परिवेश सब कुछ विराट …

परास्नातक उपाधि

प्राचीन इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत इत्यादि विषयों में स्नातक स्तर की शिक्षा उपलब्ध है। इसके अलावा …

हमारे उच्च शिक्षित प्राध्यापक

किसी भी शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता एवं छात्रों का भविष्य उस संस्थान में शिक्षा का प्रसार करने वाले प्राध्यापकों पर पूर्ण रुप से निर्भर करता है।  अतः यह बेहद आवश्यक है की संस्थान में कार्यरत सभी प्राध्यापक उच्च शैक्षिक उपाधि एवं कई वर्षों के शैक्षिक अनुभव से युक्त हो  ताकि विद्यार्थियों के मस्तिष्क में उठने वाले हर तरह के प्रश्नों का निराकरण करने में किसी तरह की कठिनाई का अनुभव ना हो।  यदि प्राध्यापकों के पास उच्च कोटि का ज्ञान होगा तो निश्चय ही उनके विद्यार्थियों में वही दूरदर्शिता विषय के प्रति गहराई एवं उत्कृष्टता दिखाई पड़ेगी इसलिए स्वामी करपात्री जी महाराज राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय उच्च गुणवत्ता वाले प्राध्यापकों की नियुक्ति करता है ताकि देश एवं समाज के भव्य निर्माण में विद्यार्थियों को एक मजबूत नीव मिल सके।

  • ईसा पूर्व छठी सदी से 20वीं सदी में लगभग द्वितीय महायुद्ध से पूर्व तक जिस राजनीतिक दृष्टिकोण (political approach) का प्रचलन रहा है, उसे अध्ययन सुविधा की दृष्टि से ‘परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण’ कहा जाता है। इसे आदर्शवादी या शास्त्रीय दृष्टिकोण भी कहा जाता है। परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण व विकास में अनेक राजनीतिक विचारकों का योगदान रहा है यथा- प्लेटो, अरस्तू, सिसरो, सन्त अगस्टीन, एक्विनास, लॉक, रूसो, मॉन्टेस्क्यू, कान्ट, (more…)

    डॉ. विजय कुमार मिश्र
  • ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से संस्कृत भाषा आर्यभाषा परिवार के अंतर्गत रखी गई है। आर्यजाति भारत में बाहर से आई या यहाँ इसका निवास था – इत्यादि विचार अनावश्यक होने से यहाँ नहीं किया जा रहा है। पर आधुनिक भाषाविज्ञान के पंडितों की मान्यता के अनुसार भारत यूरोपीय भाषाभाषियों की जो नाना प्राचीन भाषाएँ, (वैदिक संस्कृत, अवस्ता अर्थात् प्राचीनतम पारसी ग्रीक, प्राचीन गॉथिक तथा प्राचीनतम जर्मन, लैटिन, प्राचीनतम आइरिश तथा नाना वेल्ट बोलियाँ, प्राचीनतम (more…)

    डॉ. श्याम नारायण यादव
  • इंग्लिश एक वेस्ट जर्मेनिक भाषा है जिसकी उत्पत्ति एन्ग्लो-फ्रिशियन और लोअर सेक्सन बोलियों से हुई है। इन बोलियों को ब्रिटेन में 5 वीं शताब्दी में जर्मन खानाबदोशों और रोमन सहायक सेनाओं द्वारा वर्त्तमान के उत्तर पश्चिमी जर्मनी और उत्तरी नीदरलैण्ड[तथ्य वांछित] के विभिन्न भागों से लाया गया था। इन जर्मेनिक जनजातियों में से एक थी एन्ग्लेस, जो संभवतः एन्गल्न से आये थे। बीड ने लिखा है कि उनका पूरा देश ही, अपनी पुरानी भूमि को छोड़कर, ब्रिटेन आ गया था। (more…)

    डॉ. जव्वाद अहमद
  • किसी भी समाज में शारीरिक शिक्षा का महत्व उसकी युद्धोन्मुख प्रवृत्तियों, धार्मिक विचारधाराओं, आर्थिक परिस्थिति तथा आदर्श पर निर्भर होती है। प्राचीन काल में शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य मांसपेशियों को विकसित करके शारीरिक शक्ति को बढ़ाने तक ही सीमित था और इस सब का तात्पर्य यह था कि मनुष्य आखेट में, भारवहन में, पेड़ों पर चढ़ने में, लकड़ी काटने में, नदी, तालाब या समुद्र में गोता लगाने में सफल हो सके। किंतु ज्यों ज्यों सभ्यता बढ़ती गई, शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य (more…)

    प्रो. अंशुमान सिंह
  • अर्थशास्त्र पर लिखी गयी प्रथम पुस्तक कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र है। अर्थशास्त्र बहुत प्राचीन विद्या है। चार उपवेद अति प्राचीन काल में बनाए गए थे। इन चारों उपवेदों में अर्थवेद भी एक उपवेद माना जाता है, परन्तु अब यह उपलब्ध नहीं है। विष्णुपुराण में भारत की प्राचीन तथा प्रधान 18 विद्याओं में अर्थशास्त्र भी परिगणित है। इस समय बार्हस्पत्य तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र उपलब्ध हैं। अर्थशास्त्र के सर्वप्रथम आचार्य बृहस्पति थे। उनका अर्थशास्त्र सूत्रों के रूप में प्राप्त है, परंतु उसमें (more…)

    प्रो. गंगा राम वर्मा
  • 1970 के दशक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के दावे की पुनः जांच-पड़ताल आरंभ हुई। सामाजिक शोधों में आदर्शवादी सिद्धांत का पुनःप्रवर्तन और पुनरुत्थान हुआ, लेकिन एक ऐसे रूप में जो पारंपरिक आदर्शवादी दर्शन से भिन्न था। आदर्शवादी सिद्धांत जो किसी समय अपनी ज़मीन खो चुका था, एक बार फिर से अकादमिक विमर्श में अपनी छवि बनाने में कामयाब रहा। पुनः अवतरित आदर्शवादी दृष्टिकोण अब तक कई कारकों से परिष्कृत हो चुका था जिसमें बौद्धिक दुनिया में हुए विकास के साथ अंतर्राष्ट्रीय (more…)

    प्रो. नीलिमा सिन्हा
  • 20वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में समाजशास्त्र का विस्तार अमेरिका में हुआ जिसके तहत समाज के विकास से संबंधित स्थूल समाजशास्त्र और मानव के दैनंदिन सामाजिक संपर्कों से संबंधित, सूक्ष्म समाजशास्त्र, दोनों का विकास शामिल है। जार्ज हर्बर्ट मीड, हर्बर्ट ब्लूमर और बाद में शिकागो स्कूल के व्यावहारिक सामाजिक मनोविज्ञान के आधार पर समाजशास्त्रियों ने प्रतीकात्मक परस्पारिकता विकसित की। 1930 के दशक में, टेल्कोट पार्सन्स ने, चर्चा को व्यवस्था सिद्धांत (more…)

    प्रो. जंग बहादुर यादव
  • हिन्दी शब्द का सम्बंध संस्कृत शब्द सिन्धु से माना जाता है। ‘सिन्धु’ सिन्ध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिन्दू’, हिन्दी और फिर ‘हिन्द’ हो गया बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द ईक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। (more…)

    डॉ. संजय राजभर
  • समाजशास्त्र मानव समाज का अध्ययन है। यह सामाजिक विज्ञान की एक शाखा है, जो मानवीय सामाजिक संरचना और गतिविधियों से संबंधित जानकारी को परिष्कृत करने और उनका विकास करने के लिए, अनुभव जन्य विवेचन और विवेचनात्मक विश्लेषण की विभिन्न पद्धतियों का उपयोग करता है, (more…)

    प्रो. अजय कुमार यादव

महाविद्यालय तन्त्र

महाविद्यालय में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के अंतर्गत महाविद्यालय में आधारभूत संसाधनों का निर्माण एवं गुणवत्ता का ध्यान रखा जाता है। कॉलेज का अनुशासता मंडल कॉलेज परिसर में एंटी रैगिंग एवं छात्रों द्वारा किए गए जा रहे अनुचित व्यवहारों पर निरंतर अपनी दृष्टि बनाए रखता है। राष्ट्रीय सेवा योजना के अंतर्गत छात्रों को समय-समय पर प्रकृति संरक्षण, वृक्षारोपण, जल संरक्षण एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर शिक्षा का प्रचार-प्रसार आदि मानव कल्याण के कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान के अंतर्गत महाविद्यालय को समय-समय पर आधुनिक बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। छात्र कल्याण परिषद द्वारा छात्रों में रोज़गार एवं कौशल प्रशिक्षण जैसे व्यवहारिक ज्ञान को बढ़ावा दिया जाता है। महिला सहायता प्रकोष्ठ के द्वारा महाविद्यालय के छात्रों का सशक्तिकरण किया जाता है। समय-समय पर महाविद्यालय में अभिभावक एवं पुरातन छात्र सम्मेलन का आयोजन किया जाता है ताकि वर्तमान छात्रों को उनके कैरियर एवं सुनहरे भविष्य के लिए प्रोत्साहन एवं आश्वासन मिल सके।