प्रो. गंगा राम वर्मा

अर्थशास्त्र पर लिखी गयी प्रथम पुस्तक कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र है। अर्थशास्त्र बहुत प्राचीन विद्या है। चार उपवेद अति प्राचीन काल में बनाए गए थे। इन चारों उपवेदों में अर्थवेद भी एक उपवेद माना जाता है, परन्तु अब यह उपलब्ध नहीं है। विष्णुपुराण में भारत की प्राचीन तथा प्रधान 18 विद्याओं में अर्थशास्त्र भी परिगणित है। इस समय बार्हस्पत्य तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र उपलब्ध हैं। अर्थशास्त्र के सर्वप्रथम आचार्य बृहस्पति थे। उनका अर्थशास्त्र सूत्रों के रूप में प्राप्त है, परंतु उसमें अर्थशास्त्र संबंधी सब बातों का समावेश नहीं है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र ही एक ऐसा ग्रंथ है जो अर्थशास्त्र के विषय पर उपलब्ध क्रमबद्ध ग्रंथ है, इसलिए इसका महत्व सबसे अधिक है। आचार्य कौटिल्य, चाणक्य के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। ये चंद्रगुप्त मौर्य (321-297 ई.पू.) के महामंत्री थे। इनका ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ पंडितों की राय में प्राय: 2,300 वर्ष पुराना है।

आचार्य कौटिल्य के मतानुसार अर्थशास्त्र का क्षेत्र पृथ्वी को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने के उपायों का विचार करना है। उन्होंने अपने अर्थशास्त्र में ब्रह्मचर्य की दीक्षा से लेकर देशों की विजय करने की अनेक बातों का समावेश किया है। शहरों का बसाना, गुप्तचरों का प्रबंध, सेना की रचना, न्यायालयों की स्थापना, विवाह संबंधी नियम, दायभाग, शुत्रओं पर चढ़ाई के तरीके, किलाबंदी, संधियों के भेद, व्यूहरचना इत्यादि बातों का विस्ताररूप से विचार आचार्य कौटिल्य अपने ग्रंथ में करते हैं। प्रमाणत: इस ग्रंथ की कितनी ही बातें अर्थशास्त्र के आधुनिक काल में निर्दिष्ट क्षेत्र से बाहर की हैं। उसमें राजनीति, दंडनीति, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र इत्यादि विषयों पर भी विचार हुआ है।

भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थों में अर्थ (धन-सम्पदा) भी सम्मिलित है। जैन धर्म में अपरिग्रह (बहुत अधिक धन संग्रह न करना) का उपदेश किया गया है। अनेक प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में धन की प्रशंशा या निन्दा की गयी है। भर्तृहरि ने कहा है, ‘सर्वे गुणा काञ्चनम् आश्रयन्ते’ (सभी गुणों का आधार स्वर्ण ही है।)। चाणक्यसूत्र में कहा है-

सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलं अर्थः। अर्थस्य मूलं राज्यं। राज्यस्य मूलं इन्द्रिय जयः। इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा॥
सुख का मूल है, धर्म। धर्म का मूल है, अर्थ। अर्थ का मूल है, राज्य। राज्य का मूल है, इन्द्रियों पर विजय। इन्द्रियजय का मूल है, विनय। विनय का मूल है, वृद्धों की सेवा।
पाश्चात्य अर्थशास्त्र[संपादित करें]
अर्थशास्त्र का वर्तमान रूप में विकास पाश्चात्य देशों में (विशेषकर इंग्लैंड में) हुआ। ऐडम स्मिथ वर्तमान अर्थशास्त्र के जन्मदाता माने जाते हैं। आपने ‘राष्ट्रों की संपत्ति’ (वेल्थ ऑफ नेशन्स) नामक ग्रंथ लिखा। यह सन्‌ 1776 ई. में प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने यह बतलाया है कि प्रत्येक देश के अर्थशास्त्र का उद्देश्य उस देश की संपत्ति और शक्ति बढ़ाना है। उनके बाद माल्थस, रिकार्डो, मिल, जेवंस, काल मार्क्स, सिज़विक, मार्शल, वाकर, टासिग ओर राबिंस ने अर्थशास्त्र संबंधी विषयों पर सुंदर रचनाएँ कीं। परंतु अर्थशास्त्र को एक निश्चित रूप देने का श्रेय प्रोफ़ेसर मार्शल को प्राप्त है, यद्यपि प्रोफ़ेसर राबिंस का प्रोफ़ेसर मार्शल से अर्थशास्त्र के क्षेत्र के संबंध में मतभेद है। पाश्चात्य अर्थशास्त्रियों में अर्थशास्त्र के क्षेत्र के संबंध में तीन दल निश्चित रूप से दिखाई पड़ते हैं। पहला दल प्रोफेसर राबिंस का है जो अर्थशास्त्र को केवल विज्ञान मानकर यह स्वीकार नहीं करता कि अर्थशास्त्र में ऐसी बातों पर विचार किया जाए जिनके द्वारा आर्थिक सुधारों के लिए मार्गदर्शन हो। दूसरा दल प्रोफ़ेसर मार्शल, प्रोफ़ेसर पीगू इत्यादि का है, जो अर्थशास्त्र को विज्ञान मानते हुए भी यह स्वीकार करता है कि अर्थशास्त्र के अध्ययन का मुख्य विषय मनुष्य है और उसकी आर्थिक उन्नति के लिए जिन जिन बातों की आवश्यकता है, उन सबका विचार अर्थशास्त्र में किया जाना आवश्यक है। परंतु इस दल के अर्थशास्त्री राजीनीति से अर्थशास्त्र को अलग रखना चाहते हैं। तीसरा दल कार्ल मार्क्स के समान समाजवादियों का है, जो मनुष्य के श्रम को ही उत्पति का साधन मानता है और पूंजीपतियों तथा जमींदारों का नाश करके मजदूरों की उन्नति चाहता है। वह मजदूरों का राज भी चाहता है। तीनों दलों में अर्थशास्त्र के क्षेत्र के संबंध में बहुत मतभेद है। इसलिए इस प्रश्न पर विचार कर लेना आवश्यक है:

आधुनिक विश्व का आर्थिक इतिहास[संपादित करें]
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका और सोवियत संघ में शीत युद्ध छिड गया। यह कोई युद्ध नहीं था परन्तु इससे विश्व दो भागों में बँट गया।

शीत युद्ध के दौरान अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी (पश्चिम), आस्ट्रेलिया, फ्रांस, कनाडा, स्पेन एक तरफ थे। ये सभी देश लोकतंत्रिक थे और यहाँ पर खुली अर्थव्यवस्था की नीति को अपनाया गया। लोगों को व्यापार करने की खुली छूट थी। शेयर बाजार में पैसा लगाने की छूट थी। इन देशों में बहुत सारी बडी-बडी कम्पनियाँ बनीं। इन कम्पनियों में नये-नये अनुसंधान हुए। विश्वविद्यालय, सूचना प्रौद्योगिकी, इंजिनीयरी उद्योग, बैंक आदि सभी क्षेत्रोँ में जमकर तरक्की हुई। ये सभी देश दूसरे देशोँ से व्यापार को बढावा देने की नीति को स्वीकारते थे। 1945 के बाद से इन सभी देशोँ ने खूब तरक्की की।

दूसरी तरफ रूस, चीन, म्यांमार, पूर्वी जर्मनी सहित कई और देश थे जहाँ पर समाजवाद की अर्थ नीति अपनायी गयी। यहाँ पर अधिकांश उद्योगों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण होता था। उद्योगों से होने वाले लाभ पर सरकार का अधिकार रहता था। सामान्यतः ये देश दूसरे लोकतांत्रिक देशों के साथ बहुत कम व्यापार करते थे। इस तरह की अर्थ नीति के कारण यहां के उद्योगों में अधिक प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी। आम लोगों को भी लाभ कमाने के लिये कोई प्रोत्साहन नहीं था। इन करणों से इन देशों में आर्थिक विकास बहुत कम हुआ।

3 अक्टूबर-1990 को पूर्व जर्मनी और पश्चिम जर्मनी का विलय हुआ। संयुक्त जर्मनी ने प्रगतिशीलत पश्चिमी जर्मनी की तरह खुली अर्थव्यवस्था और लोक्तंत्र को अपनाया। इसके बाद 1991 में सोवियत रूस का विखंडन हुआ और रूस सहित 15 देशों का जन्म हुआ। रूस ने भी समाजवाद को छोड़कर खुली अर्थ्व्यवस्था को अपनाया। चीन ने समाजवाद को पूरी तरह तो नहीं छोड़ा पर 1970 के अंत से उदार नीतियों को अपनाया और अगले 3 वर्षों में बहुत उन्नति की। चेकोस्लोवाकिआ भी समाजवादी देश था। 1-जनवरी-1993 को इसका चेक रिपब्लिक और स्लोवाकिया में विखंडन हुआ। इन देशों ने भी समाजवाद छोड़ के लोकतंत्र और खुली अर्थव्यवस्था को अपनाया।