प्रो. नीलिमा सिन्हा

1970 के दशक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के दावे की पुनः जांच-पड़ताल आरंभ हुई। सामाजिक शोधों में आदर्शवादी सिद्धांत का पुनःप्रवर्तन और पुनरुत्थान हुआ, लेकिन एक ऐसे रूप में जो पारंपरिक आदर्शवादी दर्शन से भिन्न था। आदर्शवादी सिद्धांत जो किसी समय अपनी ज़मीन खो चुका था, एक बार फिर से अकादमिक विमर्श में अपनी छवि बनाने में कामयाब रहा। पुनः अवतरित आदर्शवादी दृष्टिकोण अब तक कई कारकों से परिष्कृत हो चुका था जिसमें बौद्धिक दुनिया में हुए विकास के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही घटनाएँ भी शामिल थीं, जैसे वियतनाम युद्ध, अमेरिका में जारी संकट ( अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों द्वारा किया जा रहा नागरिक अधिकार आंदोलन ) तथा भौगोलिक मानचित्र पर उभरते हुए नए स्वतंत्र राष्ट्र राज्य । बदलते समय और संदर्भ की पृष्ठभूमि में तेज़ गति से होते परिवर्तनों और संकट के समय में प्रशासनिक एवं बौद्धिक – सभी दिशाओं से ज्ञान की एक शाखा के रूप में राजनीति विज्ञान की कार्यशैली, प्रविधियों तथा उपयोगिता पर सवाल उठाए जाने लगे। राजनीतिक सत्ता और नेतृत्व के समक्ष विशेषकर अमेरिका में उपजी कठिन चुनौती के कारण गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। राजनीति विज्ञान में भी कोई हल नहीं निकाल पा रहा था। ऐसे में राजनीतिक के अध्ययन की शाखा के रूप में राजनीति विज्ञान की भूमिका पर प्रश्न किए जाने लगे तथा राजनीतिक समस्याओं को समझने के लिए इसकी विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त किया जाने लगा। कुछ विद्वानों ने प्रत्यक्षवाद को अराजकता, सामाजिक स्तर पर फैली बेचैनी तथा सामाजिक विघटन के लिए एक कारण के तौर पर देखा। प्रत्यक्षवादियों पर यथास्थितिवादी होने तथा किसी नैतिक खोज या सामाजिक उद्देश्य के स्थान पर निजी हित साधने के आरोप लगने लगे। समाज के कमज़ोर तबकों को सामाजिक न्याय प्रदान करने और उनकी पीड़ा को कम करने के मामले में इन तबकों के हितों की अनदेखी करने के लिए अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित प्रत्यक्षवाद की व्यापक तौर पर आलोचना की गई।

प्रत्यक्षवादियों के आलोचकों का मानना है कि प्रत्यक्षवाद राजनीतिक संस्थाओं, राजनीतिक सत्ता तथा आम आदमी के व्यवहार पर शोध के माध्यम से पूर्ण सत्य को सामने ला पाने में असफल रहा है। साथ ही संकट के समय समाज में आम स्थिति के लिए पूर्वाग्रहरहित होकर कारणों की पड़ताल कर पाने में भी यह असफल रहा है। वैज्ञानिक प्रविधियों तथा केवल अवलोकन पर आधारित सिद्धांत के निर्माण से मानव मुक्ति का उद्देश्य सफल नहीं होता। आलोचकों ने इस बात को रेखांकित किया कि सामाजिक विज्ञान का उद्देश्य दुनिया को बेहतर ढंग से समझने में योगदान देना होना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो समस्याओं का हल भी सुझाना चाहिए। रोबर्ट लिंड जैसे विचारकों के मत में सामाजिक विज्ञान संस्कृति के व्यवस्थित भाग के रूप में तथा मानव को अपनी संस्कृति को बेहतर ढंग से समझने में, समस्याओं की पहचान करने और मानव जीवन के चरम उद्देश्य को पाने के लिए सहायता करने में अहम भूमिका निभाता है। इसी प्रकार पैट्रिक एडवर्ड डोव लिखते हैं कि केवल आंकड़े एकत्र करना ही काफी नहीं है बल्कि इसके साथ ही ये राजनीतिक आंकड़े समाज को लाभ पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किए जाने चाहिए । जॉन ड्यूई ने अधिक स्पष्ट वक्तव्य देकर सामाजिक शोध की आधारवादी प्रविधि पर प्रत्यक्ष प्रहार किया। ड्यूई ने सामाजिक विज्ञान को व्यावहारिक ज्ञान कहा है जिसका अंतर्निहित उद्देश्य वैज्ञानिक खोज होना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही आधुनिक विज्ञान के विषयों में अवलोकन की सारी तकनीकें वास्तविक मुद्दों से संबन्धित होनी चाहिए । प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक खोज तथा प्रविधियों की उपयोगिता सामाजिक उपयोगिता के घटक पर निर्भर है जो अपने में मानव मुक्ति के लिए उपयोगिता पर आधारित है। इसके अतिरिक्त इस बात पर सहमति है कि सामान्य रूप से सामाजिक विज्ञान तथा विशेष रूप से राजनीति विज्ञान समाज के अध्ययन से संबंधित हैं और इसलिए संज्ञानात्मक पहलुओं के अतिरिक्त मुद्दों की आदर्शवादी समझ मानव समस्याओं को समझने में अधिक सहायक होती है। इस प्रकार समस्त समुदाय को ध्यान में रखे बिना राजनीति के बारे में विचार करना उचित नहीं है। इस प्रकार से विचार करने पर अनिवार्य रूप से आदर्शवादी दृष्टिकोण शामिल होगा जिसमें समुदाय के लिए अच्छे और बुरे के सवालों पर विचार होता है। इस प्रकार प्रत्यक्षवादी और आदर्शवादी विचारधारा एक-दूसरे से गुथी हुई है। राजनीति विज्ञान का कार्य केवल शोध करने पर आधारित नहीं होना चाहिए बल्कि इसके साथ ही सामाजिक वैज्ञानिकों में कर्तव्य की भावना, उत्तरदायित्व तथा सक्रियता भी होनी चाहिए। इस पृष्ठभूमि में आदर्शवादी अथवा नैतिक मूल्य के घटक को सामाजिक विज्ञान के शोध में महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा गया है।

मानव सभ्यता की शुरुआत से ही मानव अपने लिए नियम, विचारधाराएँ और परम्पराएँ बनाता आ रहा है यह उस भौतिक दुनिया से अलग है जहां प्रत्येक चीज़ प्राकृतिक रूप से खांचाबद्ध है और वैज्ञानिकों को अवलोकन एवं प्रयोगों के माध्यम से किसी विशेष परिदृश्य के कारणों और उसके प्रभाव की केवल खोज या पुनः खोज करनी है अथवा उसका सामान्यीकरण करना है। इस प्रकार कारण – प्रभाव संबंध प्राकृतिक विज्ञान के विषयों का मूल सिद्धांत है क्योंकि हम पाते हैं कि निर्जीव वस्तुएँ किसी भी उत्प्रेरक के प्रति समान रूप से व्यवहार करेंगी। लेकिन मानव के बारे में ऐसा सच नहीं है क्योंकि समान परिस्थितियों में प्रत्येक मानव अपने विचारों के आधार पर अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है। यहाँ तक कि प्रत्येक मानव के विचार भी संस्कृति, तर्क, मूल्यों, और उसकी अपनी प्राथमिकताओं और विलक्षणता से प्रभावित होते हैं न कि कारण – प्रभाव संबंध से। ऑकशॉट  ने प्राकृतिक दुनिया और मानव व्यवहार की प्रक्रियाओं के बीच अंतर को स्पष्ट किया हैं । उनके अनुसार प्राकृतिक प्रक्रियाएँ प्रकृति के ढांचे में अंतर्निहित हैं। इसके उलट मानव व्यवहार बौद्धिकता की मांग करता है, उन्हें सीखने, समझने और स्वीकृति की आवश्यकता होती है। नैतिकता और प्रेरणा समझने के लिए अलग प्रकार के दृष्टिकोण की आवश्यकता है। अतः मानव विज्ञान के क्षेत्र में अवलोकन तथा पूर्वानुमान (जैसा कि वैज्ञानिक अध्ययन में किया जाता है ) की अपेक्षा व्याख्या और दुनिया की समझ पर बल दिया जाता है। मानव वास्तविकता के साथ जुड़ी इन अवधारणाओं में आदर्शवादी अर्थ अंतर्निहित है। इस प्रकार आदर्शवादी सिद्धांतकारों ने मानव मुद्दों को समझने के लिए और अंतर्दृष्टि पाने के लिए वैज्ञानिक और प्रविधियों के अत्यधिक इस्तेमाल को खारिज किया तथा सामाजिक विज्ञान के अध्ययन के लिए नई प्रविधियाँ सुझाईं । इस बार आदर्शवादी दृष्टिकोण का तर्क इस बिन्दु के चारों ओर है कि सामाजिक विज्ञान का मुख्य उद्देश्य घटनाओं की महत्ता एवं उनके निहितार्थ को खोजना है। आदर्शवादियों ने घटनाओं की व्याख्या और उनकी महत्ता पर भी बल दिया है।

आधुनिक आदर्शवादी दृष्टिकोण में व्याख्यावादी सिद्धांत, आलोचनात्मक दृष्टिकोण तथा समुदायवादी (communitarian) सिद्धांत के तन्तु शामिल हैं। राजनीति के अध्ययन की व्याख्यात्मक समझ उन तौर – तरीकों पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है जो मानव गतिविधियों, मानवीय सम्बन्धों और संस्थाओं को आकार देते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार मानव मुद्दों को मानव गतिविधियों को रेखांकित करने वाले प्रासंगिक अर्थ और उद्देश्यों को जाने बिना व्यापक रूप में समझ पाना संभव नहीं है। व्याख्यावादी सिद्धांतकारों के अनुसार मानव की प्रत्येक गतिविधि तर्क, उद्देश्य और मान्यता जैसे कारकों से प्रभावित होती है। किसी राजनीतिक गतिविधि अथवा परिदृश्य के अध्ययन में मानव गतिविधि के अवलोकन के अतिरिक्त मानव की मान्यताओं और प्राथमिकताओं के अध्ययन का समावेश भी होना चाहिए। उदाहरण के लिए, लोगों का मतदान संबंधी व्यवहार वास्तव में उनकी प्राथमिकताओं से प्रभावित होता है और उसी के अनुसार वे एक विशेष तरीके से एक विशेष दल को मत देते हैं। वे दल विशेष को इसलिए चुनते हैं कि संभवतः वे उसके द्वारा प्रोत्साहित मूल्यों से सहमत होते हैं। एक आदर्शवादी सिद्धांतकार किसी राजनीतिक दल के प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में माप या आंकड़े तथा व्यक्तिपरक प्राथमिकताओं , दोनों को ध्यान में रखता है। कोई विशेष दल कितने मत प्राप्त करता है, किस निर्वाचन क्षेत्र से उसे अधिकतम मत प्राप्त हुए हैं, जैसे आंकड़ों से उसका का विचारधारात्मक झुकाव, जनता की प्राथमिकताएं और मूल्यों के बारे में जानकारी मिलती है। इनके आधार पर जनता का मतदान – व्यवहार जाना जा सकता है और उसका सामान्यीकरण किया जा सकता है।

व्याख्यावादी विचारधारा सिद्धांतों की भूमिका, तथा व्यक्ति एवं सामाजिक व्यवहार के अर्थ पर ध्यान केन्द्रित करती है। इस विचारधारा में इस बात पर बल दिया जाता है कि मानव जीवन अपने में अपूर्व है तथा इसके अपने अर्थ हैं। ऐसे में प्राकृतिक विज्ञान के विषय राजनीतिक का विश्लेषण करने के लिए अपर्याप्त हैं। इस तर्क के समर्थन में लुडविग वाइटेंस्टाइन (भाषा दार्शनिक) ने भाषा के एक सामान्य मॉडल विकसित करने की संभावना पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक सिद्धांत की भूमिका भाषायी प्रामाणिकता से बढ़कर सामाजिक संवाद को समझना है। सामान्य रूप से अर्थपूर्ण अथवा व्यवस्थित सामाजिक व्यवहार को समझ में व्याख्यावादी विचारधारा उपयोगी होती है। व्याख्यात्मक प्रविधि मूल रूप से सामाजिक व्यवहार को समझने में व्याख्यावादी विचारधारा उपयोगी होती है। व्याख्यात्मक प्रविधि मूल रूप से सामाजिक व्यवहार में गुथी हुई अवधारणाओं के सम्पूर्ण ढांचे को समझने पर केन्द्रित होती है। उदाहरण के लिए, जब व्यक्ति आपस में संवाद करते हैं तो वे समाज के व्यवहार को ध्यान में रखते हैं। वे एक विशेष ढांचे में और उस विशेष भूमिका के अनुसार व्यवहार करते हैं जो उन्हें उनके सांस्कृतिक और संस्थागत ढांचे के भीतर सौंपी गई है।  इस प्रकार मनुष्य का व्यवहार संदर्भगत होता है और सांस्कृतिक एवं संस्थागत ढांचे के अनुरूप होता है। ये ढांचे सामाजिक सक्रियता के लिए तर्क भी प्रस्तुत करते हैं। इसलिए कोई घटना घटने पर राजनीतिक वैज्ञानिक के लिए संस्कृति और संस्था विशेष के नियमों को डिकोड करना अनिवार्य हो जाता है। इस प्रक्रिया में राजनीतिक वैज्ञानिक के लिए उस परिस्थिति विशेष का कृत्रिम पुनर्गठन और उसकी व्याख्या करना आवश्यक होता है। इसके लिए उस सामाजिक गतिविधि को परिभाषित करने वाले नियमों और नियमों के पीछे की नीयत की पूरी जानकारी की आवश्यकता है। इस प्रकार व्याख्यावादी इस बात को सिरे से खारिज कर देते हैं कि सामाजिक वास्तविकता को केवल अनुभवजन्य खोज के माध्यम से समझा जा सकता है और उस वास्तविकता से किसी कामचलाऊ व्याख्यावादी पूर्वानुमान मॉडल की स्थापना की जा सकती है। प्रत्यक्ष सिद्धांतीकरण में सामाजिक व्यवहार को परिभाषित करने वाले नियमों में अंतर्निहित सिद्धांतों और मान्यताओं जैसे महत्वपूर्ण घटक को नज़रअंदाज़ किया जाता है। व्याख्यात्मक सिद्धांत के पैरोकार इस बात पर बल देते हैं कि मानव समाज जैसे प्रत्यय में ऐसी अवधारणाओं की योजना है जो प्राकृतिक विज्ञान के विषयों द्वारा प्रस्तुत व्याख्या से बिल्कुल मेल नहीं खाती।

व्याख्यात्मक दृष्टिकोण ने राजनीतिक के अध्ययन के संबंध में आदर्शवादी खोज की भूमिका की पुनर्स्थापना  की । राजनीतिक अवधारणाओं में आदर्शवादी गरिमा की पुनः प्राप्ति के लिए व्याख्यात्मक दृष्टिकोण उपयोगी सिद्ध हुआ। इसने आदर्शवादी खोज को नए अर्थ भी दिए हैं जो पारंपरिक आदर्शवादी सिद्धांत से भिन्न हैं। व्याख्यात्मक दृष्टिकोण ने पराभौतिकी के अध्ययन पर ध्यान ज़रूर दिया है लेकिन ऐसा उन्होने मूल्य प्राथमिकता और विश्व को हमारी इंद्रियों के लिए बोधगम्य बनाने के लिए किया है। लेकिन इस दृष्टिकोण ने पराभौतिकी को किसी दार्शनिक खोज के तहत नहीं रखा। व्याख्यात्मक दृष्टिकोण ने पारंपरिक आदर्शवादी दावे को खारिज कर दिया जिसके अनुसार इस विश्व के पार कोई चरम पराभौतिक सत्य होता है।

बर्लिन का कहना है कि मनुष्य की दुनिया मूल्य बहुलवाद की दुनिया है जहां भौतिक वस्तुपरक दुनिया के उलट मूल्यों में अंतर देखने को मिलता है। इस प्रकार की दुनिया को केवल अनुभवजन्य अथवा तार्किक जांच पड़ताल के आधार पर नहीं समझा जा सकता।

समुदायवादियों (communitarians) का मानना है कि विभिन्न मानव समाज अच्छाई तथा नैतिक एकजुटता की महत्वपूर्ण अवधारणाओं को सांझा करते हैं। इस प्रकार की सांझा अस्मिता और मान्यताएँ इस बात का सबूत हैं कि आदर्शवादी सिद्धांत मानव समाज के हिस्से हैं। इसलिए इन आदर्शवादी सिद्धांतों को परिभाषित करना संभव है क्योंकि ये सांझा नैतिक जनमत के मूल में विद्यमान हैं। अलासडेर मेकिंटायर जैसे समूहवादी प्रत्यक्षवादी दावे का विरोध करते हुए कहते हैं कि राजनीति के अध्ययन में विशिष्ट मूल्यों और नैतिकता के लिए विशेष स्थान है। समूहवादी अनुभवजन्य सामाजिक विज्ञान के दावों का विरोध करते हुए कहते हैं कि ‘सच्चे अर्थों में किसी वस्तुपरक वास्तविकता का अस्तित्व नहीं है’ ।  समूहवादियों के अनुसार ऐसा ज़रूरी नहीं है कि कोई भी राजनीतिक व्याख्या सही वर्णन हो, इसलिए विभिन्न राजनीतिक अवधारणाएँ व्यवहार के अवलोकन योग्य नहीं होतीं।

राजनीतिक को समझने के लिए आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी आधुनिक आदर्शवादी दृष्टिकोणों में से एक है जिसने सामाजिक विज्ञान के वैज्ञानिक अध्ययन की परंपरा को कड़ी चुनौती दी है। आलोचनात्मक सिद्धांत में विभिन्न शाखाएँ रही हैं। आलोचनात्मक सिद्धांत का उद्भव जर्मनी में फ्रेंकफ़र्ट शाखा के नाम से जानी जाने वाली पश्चिमी यूरोपीय मार्क्सवादी परंपरा से हुआ। इस शाखा से संबंधित विद्वानों ने मार्क्सवादी दृष्टिकोण को नए प्रकाश में देखने की शुरुआत की तथा मार्क्सवादी दृष्टिकोण पर नए सिरे से विचार करने पर बल दिया। आलोचनात्मक सिद्धांत ने एक अलग प्रकार के प्रविधि-प्रारूप को अपनाया और पूंजीवाद की जितनी मौलिक आलोचना हो सकती थी, उसे विकसित किया।

आलोचनात्मक सिद्धांत ने अपनी रूपरेखा की नींव मानव को गुलाम बनाने वाली परिस्थितियों से मानव विमुक्ति पर रखी । आलोचनात्मक दृष्टिकोण ने मानव समाजों में मानव सत्ता के विभिन्न पहलुओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया तथा व्याख्यात्मक और आदर्शवादी आधार पर सामाजिक जांच-पड़ताल को अपना विषय बनाया। उनकी यह सामाजिक जांच पड़ताल अपने सभी रूपों में प्रभुत्व के घटने और स्वतन्त्रता के बढ्ने पर केन्द्रित थी। राजनीति के आलोचनात्मक दृष्टिकोण के अनुसार सामाजिक जांच-पड़ताल, दर्शन और सामाजिक विज्ञान के विषयों के बीच तालमेल बिठाने में मदद करती है। मानव मुक्ति का आदर्शवादी उद्देश्य तभी प्रकट किया जा सकता है जब अन्तर्विषयक अनुभवजन्य सामाजिक शोध के माध्यम से दर्शन और सामाजिक विज्ञान के बीच मिश्रण को अनुमति दी जाएगी। इस प्रकार आलोचनात्मक सिद्धांत के पक्षधर अन्तर्विषयक शोध पर बल देते हैं जिसमें मनोवैज्ञानिक सांस्कृतिक तथा सामाजिक पहलुओं के साथ-साथ प्रभुत्व स्थापित करने वाली संस्थाओं के विभिन्न रूप भी शामिल हों। इस प्रकार किसी सिद्धांत में व्याख्या और समझ, ढांचा और एजेंसी तथा नियमितता एवं आदर्शवाद शामिल होना चाहिए। उदाहरण के लिए कोई आलोचनात्मक सिद्धांत इस बात की व्याख्या करने में सक्षम होगा कि वर्तमान समाज के साथ क्या समस्या है, किन कारकों द्वारा इसमे परिवर्तन लाया जा सकता है तथा सामाजिक परिवर्तन के लिए आलोचना के स्पष्ट नियम और प्राप्त करने योग्य व्यावहारिक लक्ष्य क्या हैं। आलोचनात्मक सिद्धांत को उन परिस्थितियों की व्याख्या और उनमें बदलाव लाने में सक्षम होना चाहिए जो मानव को गुलाम बनाती हैं। आलोचनात्मक सिद्धांत के पैरोकारों की पहली पीढ़ी मानव को अपने इतिहास का निर्माण करने में सक्षम मानती है और इस प्रकार समकालीन पूंजीवाद को जनमत के आधार पर सामाजिक जीवन में परिवर्तन करने योग्य भी मानती है।

होरखाईमियर तथा एड्रोनो जैसे आलोचनात्मक सिद्धांत के पैरोकार मानते हैं कि प्रत्यक्षवाद ने यद्यपि बौद्धिक और भौतिक, दोनों अर्थो में मानव मुक्ति की बात की लेकिन जब इसका कार्यान्वयन किया गया तो इस दृष्टिकोण ने मानव दृष्टि को अत्यंत अशक्त बना दिया। इनका मानना है कि यह पूरी तरह से वैज्ञानिक रूपरेखा थी जो विश्व को अवैयक्तिक और कामचलाऊ तंत्र के रूप में देखती है और मानव को इस तंत्र के बीच फंसे होने के रूप में देखती है। यह विचार बाज़ार तंत्र और समाज का समर्थन करता है।

प्रत्यक्ष सामाजिक विज्ञान मानव को पूरी तरह स्वतःचालित तथा प्राकृतिक नियमों से नियंत्रित मानते हैं और मानव को उसकी स्वतंत्र नैतिक क्षमता से वंचित कर देते हैं। पूंजीवादी सिद्धांत ने इसका लाभ उठाकर पूंजीवादी व्यवस्था में लोगों की दिलचस्पी पुनः जगा दी। इस प्रकार इसने सामाजिक परिवर्तन की किसी भी संभावना को नष्ट कर दिया  और प्रगतिशील प्रवृतियों को भी कुंद कर दिया।

आलोचनात्मक सिद्धांत के एक अन्य विचारक जरगन हाबरमास ने अपनी रचनाओं में आदर्शवादी आलोचना के सवाल को हल करने का प्रयत्न किया है। यद्यपि वे होरखाईमर तथा एड्रोनो से सहमत हैं और मानते हैं कि पूंजीवादी विचारधारा ही अधिक प्रमुख रही लेकिन वे इस बात से असहमत हैं कि समाज को समझने के लिए तकनीक और अनुभववाद का कोई विकल्प नहीं है। हाबरमास के अनुसार दुनिया को सांझा नियमों और परम्पराओं से अधिक कहीं कुछ है जो मानव परिस्थितियों को अधिक सार्वभौमिक बनाता है। यह तार्किकता का एक स्वरूप है जो सिद्धांतों के विषय पर तार्किक बहस की हमारी क्षमता को अभिव्यक्त करता है। तार्किकता का यह स्वरूप हमारे संवाद करने के तरीके से ज़ाहिर होता है। यहाँ हाबरमास आदर्श संवाद की बात कर रहें हैं जहां संवाद छुपे एजेंडा, पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण और मनमाने निष्कर्षों जैसी विकृतियों से मुक्त होता है और संवाद पूर्ण रूप से बेहतर तर्क द्वारा संचालित होता है। यह ऐसी परिस्थिति होती है जहां सभी भागीदारों को अपने दृष्टिकोण अथवा तर्क प्रस्तुत करने का समान अवसर मिलता है।

आदर्शवादी सिद्धांत पर हाल ही का विमर्श दर्शाता है कि आदर्शवादी सिद्धांत आज के संदर्भ में अपने बौद्धिक ओज तथा सामाजिक प्रासंगिकता को बनाए रखने में सफल रहा है। एक समय अपनी पहचान खोने के कगार पर आ गए आदर्शवादी दृष्टिकोण ने अपने पुनरुत्थान के बाद ज्ञान के मापदण्डों में अपनी स्थिति मजबूत की है। आदर्शवादी विश्लेषण में मान्यताओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जाता है, उनके पीछे के कारण को स्पष्ट किया जाता है और पराभौतिकी घटक को अध्ययन के एक विषय के रूप में देखा जाता है लेकिन अवधारणा का आधार किसी पराभौतिक मूल्य को नहीं बनाया जाता अवधारणात्मक स्पष्टता सामाजिक विज्ञान शोध का एक महत्वपूर्ण भाग है। आदर्शवादी दृष्टिकोण पर चली बहस से एक बात स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आती है कि वस्तुपरक प्रविधियों को लागू करने के अतिरिक्त राजनीतिक सिद्धांतों को उन पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए जो मनुष्य के मामले में एकदम अद्वितीय हैं। वैज्ञानिक प्रविधि लागू करने के लिए अतिउत्साहियों को यह देखना चाहिए कि इस प्रकार राजनीति के अध्ययन से राजनीतिक सिद्धांत की संभावना सीमित हो जाती है।