मध्यकालीन इतिहास

सामान्यतः मध्यकालीन भारत का अर्थ १००० इस्वी से लेकर १८५७ तक के भारत तथा उसके पड़ोसी देशों जो सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से उसके अंग रहे हैं, से लगाया जाता है।

फ़ारस पर अरबी तथा तुर्कों के विजय के बाद इन शासकों का ध्यान भारत विजय की ओर ११वीं सदी में गया। इसके पहले छिटपुट रूप से कुछ मुस्लिम शासक उत्तर भारत के कुछ इलाकों को जीत या राज कर चुके थे पर इनका प्रभुत्व तथा शासनकाल अधिक नहीं रहा था। हालाँकि अरब सागर के मार्ग से अरब के लोग दक्षिण भारत के कई इलाकों खासकर केरल से अपना व्यापार संबंध इससे कई सदी पहले से बनाए हुए थे पर इससे भी इन दोनों प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान बहुत कम ही हुआ था।

१२वीं सदी के अंत तक भारत पर तुर्क, अफ़गान तथा फ़ारसी आक्रमण बहुत तेज हो गए थे। महमूद गज़नवी के बारंबार आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत को हिला कर रख दिया। ११९२ इस्वी में तराईन के युद्ध में दिल्ली का शासक पृथ्वीराज चौहान पराजित हुआ और इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर पश्चिमी आक्रांताओं का कब्जा हो गया। हालाँकि महमूद पृथ्वी राज को हराकर वापस लौट गया पर उसके ग़ुलामों (दास) ने दिल्ली की सत्ता पर राज किया और आगे यही दिल्ली सल्तनत की नींव साबित हुई।

ग़ुलाम वंश की स्थापना के साथ ही भारत में इस्लामी शासन आरंभ हो गया था। कुतुबुद्दीन ऐबक (१२०६ – १२१०) इस वंश का प्रथम शासक था। इसके बाद इल्तुतमिश (१२११-१२३६), रजिया सुल्तान (१२३६-१२४०) तथा अन्य कई शासकों के बाद उल्लेखनीय रूप से गयासुद्दीन बलबन (१२५०-१२९०) सुल्तान बने। इल्तुतमिश के समय छिटपुट मंगोल आक्रमण भी हुए। पर भारत पर कभी भी मंगोलों का बड़ा आक्रमण नहीं हुआ और मंगोल (फ़ारसी में मुग़ल) ईरान, तुर्की और मध्यपूर्व तथा मध्य एशिया तक ही सीमित रहे।

ख़िलजी वंश को दिल्ली सल्तनत के विस्तार की तरह देखा जाता है। जलालुद्दीन फीरोज़ खिलजी, जो कि इस वंश का संस्थापक था वस्तुतः बलबन की मृत्यु के बाद सेनापति नियुक्त किया गया था। पर उसने सुल्तान कैकूबाद की हत्या कर दी और खुद सुल्तान बन बैठा। इसके बाद उसका दामाद अल्लाउद्दीन खिलजी शासक बना। अल्लाउद्दीन ने न सिर्फ अपने साम्राज्य का विस्तार किया बल्कि उत्तर पश्चिम से होने वाले मंगोल आक्रमणो का भी डटकर सामना किया।